ठेकेदार एवं पीडब्ल्यूडी गठजोड़ विकास पर हावी, नहीं हो पाया झिंझाना -ऊन मार्ग नवीनीकरण – अशवनी शर्मा
झिंझाना -ऊन मार्ग के नवीनीकरण का कार्य फिर से ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। ठेकेदार द्वारा किए गए गबन से क्षेत्र की आवाम परेशान हैं। प्रशासन द्वारा मात्र ठेकेदार के खिलाफ की गई कार्यवाही से समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है। सड़क के नवीनीकरण का इंतेज़ार क्षेत्र की जनता पिछले 4 सालों कर रही है। ऊन-झिंझाना सड़क निर्माण को लेकर लगभग एक माह तक समाजिक संस्थानों द्वारा ऊन तहसील में धरना प्रदर्शन किया गया।
इस धरने को कांग्रेस सहित विभिन्न राजनैतिक दलों के जन प्रतिनिधियों का भी समर्थन मिला। जिला प्रशासन द्वारा एक माह में समाधान कराने के आश्वासन से धरना प्रदर्शन खत्म किया गया लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात। कांग्रेस के यूवा प्रदेश महासचिव अशवनी शर्मा (सींगरा) ने बताया कि झिंझाना ऊन मार्ग की स्थिति काफी दयनीय है। सरकार इस मामले में बिल्कुल भी ध्यान नहीं दे रही है।
प्रशासन द्वारा ठेकेदार के खिलाफ की गई कार्यवाही से समस्या खत्म नहीं हुई। मार्ग नवीनीकरण कार्य पुनः बंद हो गया स्थानीय प्रशासन द्वारा उक्त सड़क निर्माण कार्य को किसी अन्य कंपनी के माध्यम से सुरु कराया जाना चाहिए था। लोक निर्माण विभाग द्वारा ठेकेदार को एक साल तक डिबार किया जाना समस्या का हल नहीं है। लोक निर्माण विभाग एवं कंस्ट्रक्शन कंपनी के बीच जरुर कुछ तय हुआ होगा जिसकी वजह से बजट बिगड़ गया।
और कंस्ट्रक्शन कंपनी नवीनीकरण कार्य नहीं करा पाई।प्रशासनिक अधिकारियों को इसका जवाब देना चाहिए कि नवीनीकरण कार्य में किस कारण अड़चनें पैदा हो रही हैं। कांग्रेस नेता अशवनी शर्मा (सींगरा) ने मुख्यमंत्री और पीडब्ल्यूडी मंत्री को ट्वीट करते हुए लिखा है कि जनपद शामली में झिंझाना ऊन मार्ग ठेकेदार और पीडब्ल्यूडी विभाग के द्वारा किए गए घोटाले की भेंट चढ़ गया है। उक्त मार्ग में गहरे गहरे गड्ढों से राहगीरों की जान आफत में रहती हैं। जर्जर हालत में पड़ा हुआ यह मार्ग आये दिन हादसों को दावत दे रहा है। स्थानीय प्रशासन शायद किसी बड़े हादसे के इंतेज़ार में है।
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ठेकेदार और पीडब्ल्यूडी विभाग के बीच के मुद्दे ने झिंझाना-ऊन मार्ग के नवीनीकरण को पूरी तरह से प्रभावित किया है। यह स्थिति वास्तव में चिंताजनक है, क्योंकि सड़क की दयनीय हालत राहगीरों के लिए खतरनाक साबित हो रही है। प्रशासन द्वारा दिए गए आश्वासनों के बावजूद, समस्या का समाधान नहीं हो पाया है, जो निराशाजनक है। क्या यह सही नहीं होगा कि इस मामले में तुरंत कार्रवाई की जाए और किसी अन्य कंपनी को यह कार्य सौंपा जाए? मुझे लगता है कि यहाँ सरकार और प्रशासन दोनों की गंभीरता पर सवाल उठता है। क्या आपको नहीं लगता कि इस तरह की लापरवाही से बड़े हादसे हो सकते हैं? अंत में, क्या यह समय नहीं है कि जनता की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए और इस मामले में जवाबदेही तय की जाए?